foresightindia03
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जन्म के समय मौजूद ग्रहों की स्थिति और नक्षत्रों के आधार पर हमारी कुंडली का निर्माण होता है और फिर यही ग्रह अपने-अपने स्वभाव के अनुरूप हमारे जीवन को चलाते हैं।आपके जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित होता है , वही आपका जन्म नक्षत्र कहलाता है । आपके सही जन्म नक्षत्र पता होने के बाद आपके बारे में बिल्कुल सही भविष्यवाणी की जा सकती है। भारतीय ज्योतिष में बहुत से नक्षत्र है जैसे की अश्विनी, मृगसर, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, विशाखा, रेवती आदि।
मूल नक्षत्र के चारों चरण धनु राशि में आते हैं। केतु गुरु धनु राशि में उच्च का होता है व इसकी दशा 7 वर्ष की होती है। इस नक्षत्र में जन्म लेने पर भी अगर लड़के का जन्म रात में और लड़की का जन्म दिन में हो तब मूल नक्षत्र का प्रभाव समाप्त हो जाता है। गण्डमूल नक्षत्र मघा के चौथे चरण में जन्म लेने वाला बच्चा धनवान और भाग्यशाली होता है।
प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं। बच्चे का जन्म अश्विनी नक्षत्र के पहले चरण में, रेवती नक्षत्र के चौथे चरण में, अश्लेषा के चौथे चरण में, मघा एवं मूल के पहले चरण में एवं ज्येष्ठा के चौथे चरण में हुआ है तब मूल नक्षत्र हानिकारक होता है। बच्चे का जन्म अगर मंगलवार अथवा शनिवार के दिन हुआ है तो इसके अशुभ प्रभाव और बढ़ जाते हैं।
इस इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाले व्यक्ति खुद के लिए भाग्यशाली होता है। व्यक्ति का जन्म अगर वृष, सिंह, वृश्चिक अथवा कुंभ लग्न में हो तब मूल नक्षत्र में जन्म होने पर भी इसका अशुभ फल प्राप्त नहीं होता है।
आज के समय में हर व्यक्ति परेशान रहता है, कोई नौकरी को लेकर कोई शादी , बिज़नेस आदि समस्याओ को लेकर और ये सब हमारी लगन कुंडली में बने अशुभ ग्रहो की दशा, महादशा चलने परहोता है उन ग्रहो को प्रभाव काम करने के लिए रतन को धारण करना एक अच्छा उपाय है.
हर मनुष्य की जन्मपत्री मे कोंई न कोई ग्रह शुभ और अशुभ होते है औंर जिसके कारण ही उनके भाग्य में परिवर्तन आता रहता है।
ज्योतिषो का कहना है की रत्न धारण कर के आप अपनी कुंडली के अशुभ ग्रहों के प्रभाव को कम कर सकते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कई प्रकार के रत्न होते हैं। हर रत्न किसी विशेष परेशानी या किसी खास मकसद से ही धारण किया जाता है। यह बत गौरतलब है कि हर रत्न को धारण करने से पहले किसी ज्ञानी ज्योतिषी की राय ले लेनी चाहिए।
अन्यथा गलत रत्न धारण करना बड़ी मुसीबत ला सकता है।
क्यंकि रत्न दोधारी तलवार की तरह होते हैं जिन्हें उचित जांच परख के बाद ही पहनना चाहिए अन्यथा सकारात्मक की जगह नकारात्मक परिणाम भी देते हैं.इसके लिए कुंडली का निरीक्षण जरूरी होता है।
लग्न कुंडली, नवमांश, ग्रहों, दशा-महादशा आदि का अध्ययन करने के बाद ही रत्न पहनने की सलाह दी जाती है।
जो लोग इन रत्नों को धारण कर रहे है उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में लाभ मिल रहा है चाहे व्यवसाय, पढाई, बीमारी या तरक्की क्यों न हो सभी क्षेत्रो में रत्न का विशेष महेत्व है!
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जन्म के समय मौजूद ग्रहों की स्थिति और नक्षत्रों के आधार पर हमारी कुंडली का निर्माण होता है और फिर यही ग्रह अपने-अपने स्वभाव के अनुरूप हमारे जीवन को चलाते हैं।आपके जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित होता है , वही आपका जन्म नक्षत्र कहलाता है । आपके सही जन्म नक्षत्र पता होने के बाद आपके बारे में बिल्कुल सही भविष्यवाणी की जा सकती है। भारतीय ज्योतिष में बहुत से नक्षत्र है जैसे की अश्विनी, मृगसर, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, विशाखा, रेवती आदि।
मूल नक्षत्र के चारों चरण धनु राशि में आते हैं। केतु गुरु धनु राशि में उच्च का होता है व इसकी दशा 7 वर्ष की होती है। इस नक्षत्र में जन्म लेने पर भी अगर लड़के का जन्म रात में और लड़की का जन्म दिन में हो तब मूल नक्षत्र का प्रभाव समाप्त हो जाता है। गण्डमूल नक्षत्र मघा के चौथे चरण में जन्म लेने वाला बच्चा धनवान और भाग्यशाली होता है।
प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं। बच्चे का जन्म अश्विनी नक्षत्र के पहले चरण में, रेवती नक्षत्र के चौथे चरण में, अश्लेषा के चौथे चरण में, मघा एवं मूल के पहले चरण में एवं ज्येष्ठा के चौथे चरण में हुआ है तब मूल नक्षत्र हानिकारक होता है। बच्चे का जन्म अगर मंगलवार अथवा शनिवार के दिन हुआ है तो इसके अशुभ प्रभाव और बढ़ जाते हैं।
इस इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाले व्यक्ति खुद के लिए भाग्यशाली होता है। व्यक्ति का जन्म अगर वृष, सिंह, वृश्चिक अथवा कुंभ लग्न में हो तब मूल नक्षत्र में जन्म होने पर भी इसका अशुभ फल प्राप्त नहीं होता है।
आज के समय में हर व्यक्ति परेशान रहता है, कोई नौकरी को लेकर कोई शादी , बिज़नेस आदि समस्याओ को लेकर और ये सब हमारी लगन कुंडली में बने अशुभ ग्रहो की दशा, महादशा चलने परहोता है उन ग्रहो को प्रभाव काम करने के लिए रतन को धारण करना एक अच्छा उपाय है.
हर मनुष्य की जन्मपत्री मे कोंई न कोई ग्रह शुभ और अशुभ होते है औंर जिसके कारण ही उनके भाग्य में परिवर्तन आता रहता है।
ज्योतिषो का कहना है की रत्न धारण कर के आप अपनी कुंडली के अशुभ ग्रहों के प्रभाव को कम कर सकते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कई प्रकार के रत्न होते हैं। हर रत्न किसी विशेष परेशानी या किसी खास मकसद से ही धारण किया जाता है। यह बत गौरतलब है कि हर रत्न को धारण करने से पहले किसी ज्ञानी ज्योतिषी की राय ले लेनी चाहिए।
अन्यथा गलत रत्न धारण करना बड़ी मुसीबत ला सकता है।
क्यंकि रत्न दोधारी तलवार की तरह होते हैं जिन्हें उचित जांच परख के बाद ही पहनना चाहिए अन्यथा सकारात्मक की जगह नकारात्मक परिणाम भी देते हैं.इसके लिए कुंडली का निरीक्षण जरूरी होता है।
लग्न कुंडली, नवमांश, ग्रहों, दशा-महादशा आदि का अध्ययन करने के बाद ही रत्न पहनने की सलाह दी जाती है।
जो लोग इन रत्नों को धारण कर रहे है उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में लाभ मिल रहा है चाहे व्यवसाय, पढाई, बीमारी या तरक्की क्यों न हो सभी क्षेत्रो में रत्न का विशेष महेत्व है!